बारह राशियों से भी बहुत पहले, वैदिक परंपरा ने आकाश को 27 नक्षत्रों में बाँटा था। ये चंद्रमा के ठहरने के स्थान हैं, जिनसे होकर चंद्रमा लगभग एक महीने में अपना चक्कर पूरा करता है। हर नक्षत्र लगभग 13°20' का होता है, उसके अपने अधिष्ठाता देवता और स्वामी ग्रह होते हैं और उसका अपना अलग स्वभाव होता है।
आपका जन्म नक्षत्र
आपके जन्म के समय चंद्रमा जिस नक्षत्र में था, वही आपका जन्म नक्षत्र कहलाता है। इसी से आपके पारंपरिक नाम का पहला अक्षर तय होता है, यह पता चलता है कि आपकी पहली दशा कौन-सी है, और आपके स्वभाव का बड़ा हिस्सा भी इसी से समझा जाता है। पूरी कुंडली में यह सबसे निजी बिंदुओं में से एक है।
नक्षत्रों का उपयोग किन बातों में होता है
- स्वभाव: हर नक्षत्र का अपना स्वभाव, अपनी खूबियाँ और अपनी सीख होती है।
- मुहूर्त: विवाह, यात्रा और नए काम की शुरुआत के लिए शुभ समय चुनने में।
- अनुकूलता: विवाह के लिए कुंडली मिलान में नक्षत्र मिलान की मुख्य भूमिका होती है।
- दशा: विंशोत्तरी दशा का क्रम आपके जन्म नक्षत्र से ही शुरू होता है।
कुछ उदाहरण
- अश्विनी (देवता: अश्विनी कुमार): फुर्तीला, उपचार करने वाला और नई राह बनाने वाला।
- रोहिणी (देवता: ब्रह्मा/प्रजापति): रचनात्मक, आकर्षक और उर्वरता से भरा।
- पुष्य (देवता: बृहस्पति): पोषण करने वाला, इसे सबसे शुभ नक्षत्र माना जाता है।
- मघा (देवता: पितर): राजसी, पूर्वजों और अधिकार से जुड़ा।
पद (चरण)
हर नक्षत्र चार पदों (चरणों) में बँटा होता है। ये पद नक्षत्र को नवांश कुंडली से जोड़ते हैं और उसके अर्थ को और बारीकी से समझने में मदद करते हैं। इसी कारण एक ही चंद्र राशि वाले दो लोग भी एक-दूसरे से अलग हो सकते हैं, क्योंकि हो सकता है उनका नक्षत्र, या पद भी, एक न हो।
